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चिट्ठाजगत
''हिन्दुस्तान का दर्द'' देश में बढ़ रही अपराधिक गतिविधियों,छात्रों के द्वारा की जा रही आत्महत्याओं एवं देश में बढ रही आतंकबादी हरकतों का विरोध करता है.. हिन्दुस्तान का दर्द का यह विरोध दिखाई देगा उसके रंग एवं शब्दों की आग से.... तो देश के खुदगर्ज नेताओं एवं नागरिकों को यह ''ब्लैक न्यू इयर '' मुबारक हो.... संजय सेन सागर

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Thursday, January 7, 2010

लो क सं घ र्ष !: आयातित कार्यपालिका

भारतीय संस्कार, गरिमा, नैतिक मूल्यों की बात करते हैं उच्च पदस्थ लोग इन सारे चीजों से वंचित होकर पदीय दायित्व का निर्वाहन करते हैं. व्यवहार में अगर ऊपर लिखे गए शब्दों का बोध जरा सा भी इन लोगों में जाए तो बहुत सारी समस्याएं जो इनके द्वारा प्रतिदिन पैदा की जाती हैं वह समाप्त हो जाएँयह समस्याओं का समाधान नहीं खोजते हैं अपितु खोज के नाम पर एक बड़ी समस्या खड़ी कर देते हैंविधि का निर्माण करने वाली संस्थाएं लगभग तीन दशकों से इन्ही उच्च पदस्थ लोगों द्वारा निर्धारित प्रारूप पर लिखी गई बात को कानून बना दिया है जिसके कारण व्यवहार में आए दिन दिक्कतें या समस्याएं पैदा होती रहती हैं देश के अन्दर ऐसे कानूनों का निर्माण इनके कुशल दिशा-निर्देशन में हो चुका है कि उसके ऊपर एक छोटी सी कहानी लिखना ही उचित होगा वह कहानी यह है कि जंगल के राजा ने आदेश किया कि सभी शैतान बंदरों को पकड़ लोइस उद्घोषणा के बाद जंगल के ऊंट भी भागने लगे एक ने ऊंट को रोक कर पूछा कि आप क्यों भाग रहे हैंबंदरों के लिए आदेश हुआ है, ऊंट ने कहा कि अगर मुझे निरुद्ध कर दिया गया पूरी जिंदगी यह साबित करने में लग जाएगी कि मैं ऊंट हूँ . इसलिए भाग रहा हूँ
भारतीय वर्तमान व्यवस्था में इसी तरह विधि का निर्माण हो रहा है और उसको लागू करने वाली कार्यपालिका का हाल भी यही है कई बार व्यक्ति के जिन्दा रहने के बावजूद उसी व्यक्ति की हत्या के आरोप में लोगों को आजीवन कारावास तक की सजा हो चुकी है न्यायलय वारंट जारी नहीं करते हैं और अभियुक्त जो बराबर पेशी पर रहा होता हैपुलिस वारंट के नाम पर पकड़ कर अदालत के समक्ष पेश भी कर देती हैपत्रावली देखने पर मालूम होता है कि न्यायलय ने वारंट जारी ही नहीं किया हैअगर हमारी कार्यपालिका के प्रमुखों में इस देश के प्रति जरा भी ईमानदारी, नैतिकता का बोध हो तो ये समस्याएं सामान्य तरीके से हल हो सकती हैं एक छोटा सा उदहारण लिख रहा हूँ कि जिला मजिस्टेट चरित्र प्रमाण पत्र जारी करते हैंप्रार्थना पत्र के साथ सम्बंधित लिपिक को मात्र सौ रुपये देना तुरंत अनिवार्य हैइसके पश्चात प्रार्थना पत्र की कांपी पुलिस अधीक्षक कार्यालय जाती है, वहां पर सरकारी फीस 20 रुपये जमा करने के लिए 100 रुपये देना होता हैवहां से प्रार्थना पत्र सम्बंधित थाने को जाता हैथाने वाले कम से कम 1000 रुपये प्रार्थना पत्र पर रिपोर्ट लगाने के लिए लेते हैं और जब यह रिपोर्ट लौट कर पुलिस अधीक्षक कार्यालय लौट कर आती है तो मालूम चलता है कि थानाध्यक्ष ने रिपोर्ट निर्धारित प्रोफार्मे पर प्रेषित नहीं की है और फिर थाने पर उतने ही रुपये खर्च कर निर्धारित प्रोफार्मे पर रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक कार्यालय आती हैपुलिस फिर लोकल इंटेलीज़ेंस यूनिट से रिपोर्ट मांगी जाती हैवहां भी लगभग 500 रुपये अवैध रूप से देने पड़ेंगे वर्ना वे कभी रिपोर्ट नहीं लगायेंगेप्रार्थना पत्र अपराध नियंत्रण ब्यूरो जाता है जहाँ पर अवैध रूप से आपने रुपया नहीं दिया तो जनपद के समस्त थानों से रिपोर्ट नहीं लग पाती हैइतना सब करने में लगभग 2000 रुपये और एक महीने बराबर भाग दौड़ के बाद पुलिस अधीक्षक चरित्र प्रमाण पत्र के लिए जिला मजिस्टेट को संस्तुति करते हैंइसके पश्चात जिला मजिस्टेट के यहाँ कोई कोई कामा. फूल्स्टॉप लगा कर पुलिस अधीक्षक को वापस भेज दिया जाता हैफिर वह कमी 15 दिन में ठीक कराकर जिला मजिस्टेट कार्यालय भेजवाइये तब वहां एक अच्छी खासी रकम दीजिये तब जाकर जिला मजिस्टेट से चरित्र प्रमाण पत्र प्राप्त होगाअगर इस कार्यवाही में 6 माह से अधिक लग गए तो पुनः यही प्रक्रिया अपनाई जाएगीहमारी कार्यपालिका में इच्छा शक्ति का अभाव है या कभी कभी ऐसा महसूस होता है की कार्यपालिका हमारे देश की होकर आयातित कार्यपालिका है

सुमन
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बेदम रहीं बोलोराम, 3 इडियट का सम्मोहन

बॉक्स ऑफिस:पहलासप्ताह बोलोराम, रात गई बात गई और एक्सीडेंट ऑन हिल रोड जैसी फिल्मों के साथ साल 2010 शुरु हुआ लेकिन बॉक्स ऑफिस पर इन फिल्मों को दर्शकों का कोई विशेष प्रसाद नहीं मिला। दरअसल 3 इडियट का सम्मोहन बॉक्स ऑफिस पर कुछ इस कदर चला कि इस फिल्म ने अपने दूसरे सप्ताह में भी हाउसफुल गई है।



एक तरफ 3 इडियट अपनी कहानी, खास किस्म की मार्केटिंग और लेखन पर अधिकार को लेकर विवाद के चलते चर्चा में रही वहीं इस शोर में साल 2010 की तिनों फिल्में मात खा गई। बोलोराम और एक्सीडेंट ऑन हिल रोड कमजोर स्टॉर कास्ट और बेदम पटकथा के चलते दर्शकों को ध्यान नहीं खीच पाई हा रात गई बात गई ने मेट्रो शहरों में कुछ दर्शक जरूर जुटाए लेकिन यह संख्या ऐसी नहीं थी जो कुछ उम्मीद जगाती हो।



कुल मिलाकर नई फिल्मों के लिए साल 2010 का पहला सप्ताह बेहद निराशाजनक रहा है और 3 इडियट ने ब्लॉकबस्टर सफलता हासिल कर एक नया रिकार्ड अपने नाम कर लिया है। एक तरफ दमदार पटकथा, सोचा समझा प्रचार और जनता को क्लीक कर गया तो दूसरी तरफ साल की पहली तीन फिल्में असफल साबित हुई है।



यहां तक की छोटे शहरों में भी दर्शक इन फिल्मों को देखने नहीं पहुंचा है। लेकिन 3 इडियट ने अपनी सफलता से बॉक्स ऑफिस पर जिस तरह से भीड़ जुटाई है उससे बॉलीवुड में खुशी का माहौल है और 8 तारीख को रिलीज होने जा रही लब इंपासिबल और दुल्हा मिल गया है से बॉलीवुड की उम्मीदें बढ़ गई है। बड़े बैनर की इन दोनों फिल्मों पर सबकी नजर लगी हुई है।


bhaskar.com

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Wednesday, January 6, 2010

लो क सं घ र्ष !: लोकतंत्र का नया संस्करण

उत्तर प्रदेश में स्थानीय निकाय के सदस्यों द्वारा विधान परिषद् सदस्य चुनाव हो रहा है सरकार की मशीनरी सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशियों के लिए मतदाता प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्यों नगर परिषद्, टाउन एरिया आदि के सदस्यों को पकड़-पकड़ कर पुलिस द्वारा थानों में ले जाया जा रहा है उनको कहा यह जा रहा है कि वह सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी को वोट दे दें जिसके लिए थानाध्यक्ष तरह-तरह के प्रलोभन दे रहे हैंप्रलोभन से मानने वाले मतदाताओं को डराने धमकाने का भी कार्य पुलिस द्वारा जारी हैइस तरह से चुने गए विधान परिषद् सदस्य क्या जनता के प्रति उत्तरदायी होंगे या सम्बंधित पुलिस अधिकारियों के एजेंट के रूप में कार्य करते हुए माननीय सदस्यगण दिखेंगे। यहीं से पुलिस और राजनेताओं का गठजोड़ शुरू होता है पुलिस अपना मूल कार्य अप्रध्नियंत्रण छोड़कर माननीय सदस्यों के दम पर अपराधियों को संरक्षण देने का कार्य शुरू कर देते हैं उनके पर्वेक्षण अधिकारी राजनेताओं के दर से उनके खिलाफ कोई कार्यवाई भी नहीं कर सकते हैं । इस चुनाव में पक्ष और विपक्ष के प्रत्याशियों द्वारा उद्योगपतियों द्वारा प्राप्त रुपयों से मतदाताओं को पांच हजार रुपये से पचास हजार रुपये तक की बोली लग रही है। विभिन्न प्रत्याशियों द्वारा मतदाताओं को 10-15, 20-25 के समूह में इकठ्ठा कर उनके भोग-विलास की वस्तुएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। यह है हमारे देश के लोकतंत्र का नया संस्करण जिसमें सबकुछ जायज है ।...आगे पढ़ें!

बिजली न डीजल पानी खींचे हर पल

उज्जैन से 20 किमी दूर छोटे से गांव कांकरिया चीराखान में नए दशक की उम्मीदें आकार ले रही हैं। यहां एक छोटे से वर्कशॉप में सिर झुकाए, हाथों में ग्रीस लगाए राधेश्याम शर्मा एक ऐसी मशीन बनाने में जुटे हैं जो बिना बिजली या डीजल के 24 घंटे बोरवेल से पानी खींचेगी। इस प्रयोग के सफल होने पर न केवल बिजली की कमी से जूझ रहे लाखों किसानों को फायदा होगा, बल्कि प्रदूषण न होने के कारण पर्यावरण की सेहत भी सुधरेगी।

शर्मा बताते हैं, यह मशीन न तो खराब होगी, न ही इसमें कोई अतिरिक्त खर्च होगा। यानी बिजली, डीजल, मोटरपंप की मरम्मत के बार-बार के खर्च से हमेशा के लिए छुटकारा। शर्मा की मानें तो हवा और पानी के दबाव से चलने वाली यह मशीन 24 घंटे पानी देती रहेगाी। इसकी लागत 50 हजार से एक लाख रुपए के बीच आने का अनुमान है। एक स्थानीय बैंक ने इसके लिए उन्हें आर्थिक मदद देने का भरोसा दिया है। महज हायर सेकंडरी तक पढ़े राधेश्याम को इंजीनियरिंग विरासत में मिली है। उनके पिता जगदीशचंद शर्मा मोटर मैकेनिक रह चुके हैं, ताऊ भी गांव में ही मशीनें सुधारने के लिए वर्कशॉप चलाते हैं।

ग्रामीणों और किसानों की मशीनें ठीक करते-करते राधेश्याम कब इनोवेटर बन गए, उन्हें पता ही नहीं चला। महज 31 साल के राधेश्याम इस समूचे क्षेत्र में कृषि उपकरणों का आविष्कारक माने जाते हैं। वे ऐसे उपकरण बनाने में जुटे हुए हैं, जो किसान को सहूलियत दें, समय और पैसा भी बचाए, साथ ही बिजली और डीजल की खपत भी रोकें।


वे एक ऐसी मशीन भी बनाना चाहते हैं, जो बोरवेल में फंसी मोटर निकाल सके। इसके लिए वे जीप का प्रयोग करेंगे। मशीन बनाने का काम अभी पूरा नहीं हुआ है लेकिन उन्होंने जीप जरूर खरीद ली है। वे इससे पहले बैलचलित छिड़काव वाली मशीन बना चुके हैं। यह दवा छिड़काव के साथ निदाई के काम भी आती है। वे बताते हैं, मजदूरों पर 1000 रु. खर्च करने पर जितना काम होता है, उतना काम यह मशीन 200 रु. के खर्च में कर देती है। वे अब तक ऐसी 17 मशीनें बेच चुके हैं।’


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Tuesday, January 5, 2010

लो क सं घ र्ष !: बेनी प्रसाद का कांग्रेस में भविष्य

आजकल उत्तर प्रदेश में फिर बेनी प्रसाद वर्मा राजनीति की सुर्ख़ियों में हैं। कांग्रेस पार्टी से गोंडा के सांसद बेनी प्रसाद वर्मा ने अपने गृह जनपद बाराबंकी की राजनीति में अपना हस्तक्षेप न सिर्फ जारी रखा है बल्कि कांग्रेसी सांसद पुनिया से उनकी ठन गयी है। कारण स्थानीय निकाय के लिए विधान परिषद् सीट के चुनाव में उनका खुले आम बसपा प्रत्याशी को समर्थन का एलान करना और अपने इस निर्णय में कांग्रेस के राष्ट्रीय महामंत्री एवं प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह के नाम को घसीटने पर प्रदेश के कांग्रेसी इतने आग बबूला हो चुके हैं कि उनके निष्कासन की सिफारिश पी.सी.सी सदस्यों की तरफ से कांग्रेस आलाकमान को कर दी गयी है।

समाजवादी तहरीक से पोषित हो कर राजनीति में अपना कदम रखने वाले बेनी वर्मा के राजनीतिक जीवन का आगाज चरण सिंह के लोकदल से हुआ जो अपनी चौधरी चरण सिंह स्टाइल की ऐंठ व बरर के साथ राजनीति में अपनी स्वार्थ की प्रवत्ति के लिए प्रसिद्ध थे। बेनी का फिर साथ हुआ उस मुलायम सिंह से जिन्होंने अपने कर्णधार विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ घात करके समाजवादी पार्टी का गठन वर्ष 1989 में किया। फिर कशीराम के साथ उनका गठबंधन 1992 मनें बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद हुआ परन्तु वह भी मात्र डेढ़ वर्षों में ढेर हो गया।
उसके बाद बेनी प्रसाद वर्मा व मुलायम सिंह के रिश्तों में खटास समाजवादी पार्टी में अमर सिंह की आमद के बाद शुरू हुई जो अंत में 2007 के चुनाव से पूर्व बेनी के पार्टी से बागी होने के बाद पूर्णतया कड़वाहट में बदल गयी। बेनी ने अलग अपने दल का गठन समाजवादी क्रांति दल (एस.के.डी) कर के इंडियन जस्टिस पार्टी के साथ समझौता किया और पूरे प्रदेश में चुनाव लड़े परन्तु उन्हें जबरदस्त विफलता हाथ लगी यहाँ तक कि उनके गृह जनपद बाराबंकी में भी उनका सफाया हो गया उनका पुत्र एवं भूतपूर्व राज्य मंत्री राकेश कुमार वर्मा को भी अपने पिता की कर्म भूमि मसौली से शिकस्त खानी पड़ी।
राजनीति में सब कुछ लुटाने के बाद बेनी प्रसाद ने कांग्रेस की डगर पर आ कर विराम किया और कांग्रेस ने उन्हें सम्मान देते हुए गोंडा से न सिर्फ टिकट दिया बल्कि देवीपाटन की लगभग सात सीटों का टिकट उनकी सलाह ले कर दिया। बेनी वर्मा खुद भी जीते और फैजाबाद बहराइच श्रावस्ती, सुल्तानपुर और महाराजगंज पर कांग्रेस को जीत दिलाई बाराबंकी में 1984 के बाद 25 साल के लम्बे अरसे बाद कांग्रेस को सफलता पुनिया की जीत के तौर पर मिली। इसमें कोई शक नहीं कि यदि बेनी की कुर्मी बिरादरी का समर्थन पुनिया को न होता और एक बड़ा बेस वोट बैंक पुनिया के पास न होता तो फिर पुनिया की सफलता की राह आसान न होती।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सफलता का डंका भले ही बेनी वर्मा के लोग पीटते फिरें परन्तु कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व व प्रदेश कांग्रेस इसे राहुल का करिश्मा मानते हैं और सपा, बसपा व भाजपा से परेशान होकर ऊब चुकी जनता का पुन: कांग्रेस की ओर वापसी मान रहे हैं। उधर बेनी है कि आज भी अपने अड़ियल रवैये पर टिके हैं और उस पार्टी को आँख दिखा रहे हैं जिसके बारे में यह कहा जाता है कि वह राजनीति का महासागर है जिससे अलग होकर सभी दरिया निकले हैं चाहे वह भाजपा हो या समाजवादी, चाहे वह लोकदल हो या डी.ऍम.के , अन्ना डी ऍम.के चाहे वह तृणमूल कांग्रेस हो या राष्ट्रवादी कांग्रेस। यहाँ तक की भारतीय जनसंघ भी कांग्रेस के कोख से पैदा हुई पार्टी है. केवल कम्युनिस्ट पार्टियों को यह गौरव प्राप्त है कि उनका उदय कांग्रेस की कोख से नहीं हुआ।
जहाँ तक कांग्रेस में बेनी वर्मा के भविष्य का प्रश्न है तो वह बहुत उज्जवल नजर नहीं आता क्योंकि बेनी प्रसाद वर्मा की राजनीतिक पृष्टभूमि स्वार्थ की राजनीति और अवसरवादिता की बैसाखी पर टिकी हुई है विचारों के आधार पर कभी भी उनकी समानता कांग्रेसियों से नहीं हो सकती. कांग्रेस ने वर्ष 2007 में यदि बेनी वर्मा के कंधे पर हाथ रखा तो उसका लक्ष्य मुलायम व उनकी पार्टी सपा को कमजोर करना था सो उन्होंने सफलता के साथ वह कारनामा अंजाम दिया। अब चूँकि 2012 का आपरेशन उत्तर प्रदेश का लक्ष्य अभी कांग्रेस को प्राप्त करना है इसलिए बेनी वर्मा के बडबोलेपन को वह बर्दाश्त कर रही है परन्तु अधिक समय तक नहीं।
उधर बेनी वर्मा को भी एस.के.डी के प्रयोग के विफल हो जाने के पश्चात एक राजनीतिक छतरी की आवश्यकता थी सो वह उसके नीचे से आसानी से निकलने वाले नहीं जबतक उन्हें कोई नई छतरी न मिल जाए।

मो॰ तारिक खान...आगे पढ़ें!

ब्लैक न्यू इयर मुबारक हो


''हिन्दुस्तान का दर्द'' देश में बढ़ रही अपराधिक गतिविधियों,छात्रों के द्वारा की जा रही आत्महत्याओं एवं देश में बढ रही आतंकबादी हरकतों का विरोध करता है..
हिन्दुस्तान का दर्द का यह विरोध दिखाई देगा उसके रंग एवं शब्दों की आग से....
तो देश के खुदगर्ज नेताओं एवं नागरिकों को यह ''ब्लैक न्यू इयर '' मुबारक हो....

संजय सेन सागर
संपादक


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Monday, January 4, 2010

लो क सं घ र्ष !: फास्ट ट्रैक कोर्ट पर विचरण का एक दृश्य

फास्ट ट्रैक कोर्ट पर अपराधिक वादों का विचारण सम्पूर्ण विधि व्यवस्था के लिए चुनौती पूर्ण कार्य है प्रतिमाह माननीय न्यायधीश महोदय को 14 वादों का निर्णय करने के ठेके के साथ नियुक्त मिली है या यूँ समझो कि ऍफ़.टी.सी न्यायधीश को 14 वाद का निस्तारण प्रति माह करना आवश्यक हैजिसके कारण विचारण में पेशकार गवाह की गवाही लिख रहे होते हैं उसी समय अहलमद भी गवाही लिख रहे होते हैं , न्यायधीश महोदय भी गवाही लिख रहे होते हैंजबकि नियम यह है एक समय में एक ही वाद का विचारण हो सकता है इसके विपरीत एक समय में एक ही न्यायलय में 6-6 मुकदमो का विचारण हो रहा होता है . स्टेनो गवाही के उपरांत होने वाले जजमेंट को टाइप कर रहे होते हैं न्यायलयों में होने वाले जजमेंट भी स्टेनो टाइप कर डालते हैंबचाव पक्ष के अधिवक्ता के समक्ष सजा के पक्ष को सुनकर सजा लिखी जाती हैइस तरह पूरी प्रक्रिया विधि के अनुरूप होकर अपराधिक वादों को निर्णीत करने का काम जारी है जिससे गुण दोष के आधार पर वादों का निस्तारण नहीं हो पा रहा हैएक माह में 14 वादों का निस्तारण किसी भी कीमत पर नहीं हो सकता है प्रतिदिन एक वाद का निस्तारण आवश्यक है छुटियाँ आदि छोड़ कर 22-23 दिन से ज्यादा न्यायालयों की कारवाई नहीं होती है . इस प्रक्रिया के चलते माननीय उच्च न्यायलयों में अपीलों का ढेर लग गया है जेलें ठसा-ठस भरी हुई हैं बहुत सारी चीजें लिखी नहीं जा सकती हैंन्यायलयों की अवमानना हो जाएगी यह भी लिखने का साहस नहीं हो रहा है क्षमा याचना के साथ एक छोटा सा दृश्य लिखा जा रहा हैअक्सर ब्लॉगर साथी अनुरोध करते हैं कि न्यायपालिका भ्रष्टाचारों के बारे में जनता के बीच में जानकारी आनी चाहिएअगर वह सब लिख दिया जायेगा तो निश्चित रूप से मेरी जगह मेरे घर होकर कारागार में होगी और मेरा परिवार भुखमरी की तरफ बढ़ने लगेगाबड़ी हिम्मत के साथ और क्षमा मांगते हुए यह लिखा जा रहा है

सुमन
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घर से भागी हुई एक लड़की का ख़त

प्रिय मित्रों,

 

श्री योगेश छिब्बर ने एक कहानी लिखी है जो कुछ यों शुरु होती है -

 

पापा:
 
आपके पिता होने में सुंदरता है, कोमलता, कोई मीठा गीत। आपकी बेटी होना अपमान है, अपराध है, पाप है; आप मेरे स्त्री होने की सुंदरता पर हावी नहीं हो सकते। इसीलिए मैं आपको अपनी बाक़ी ज़िंदगी में से घटा देना चाहती हूँ।  मैं चाहती हूँ आप शून्य हो जाएँ, मेरे वजूद में से बाहर हों, ताकि मैं खूबसूरत और मुकम्मल हो सकूँ।

 

श्री योगेश छिब्बर की पूरी कहानी यहां प्रकाशित हुई है व इस कहानी पर प्रतिक्रिया भी ।

 

जहां तक, इस कहानी का संबंध है, मैं इसे पसन्द नहीं कर पा रहा हूं। फर्क दृष्टिकोण का है। मुझे यह समझ नहीं रहा कि आखिर योगेश छिब्बर पाठकों को इस कहानी के माध्यम से संदेश क्या देना चाह रहे हैं। जो संदेश मुझे इस कहानी से मिलता प्रतीत हो रहा है वही यदि इस कहानी का वास्तविक संदेश है तो मुझे यह संदेश तो जनहित में लगता है और ही स्वीकार्य ही है।

 

-  सुशान्त सिंहल

 

  आप भी इसे पढ़ें व अपनी प्रतिक्रिया दें तो यह सार्थक संवाद आगे बढ़ सकेगा ।

 

सुशान्त सिंहल

 

 

 

 

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Sunday, January 3, 2010

लो क सं घ र्ष !: मोहे आई न जग से लाज..........

महाराष्ट्र के मुंबई में माफिया ड़ॉन छोटा राजन के गैंग सरगना पालसन जोसेफ की (चेम्बूर जिमखाना क्लब) क्रिसमस पार्टी में पांच उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारियों ने डांस ठुमके. शायद जीवन में उन्हें पहली बार अपराधियों के साथ खुलकर गठजोड़ जिंदाबाद करने से अत्यधिक उल्लास मिला होगा और उन्होंने पंकज उदास को मात करते हुए गाया होगा "मोहे आई जग से लाज, मैं इतना जोर से नाची आज , की घुंघरू टूट गये "
पुलिस अपराधी गठजोड़ की यह छोटी मिसाल है अपराधियों ने राजनेताओं, पुलिस के उच्च से उच्चतम अफसर तक गठजोड़ बना लिया है अपराधियों ने न्यायिक अधिकारियो में भी निचले स्तर पर पहुँच बना रखी है जिससे आम जनता को इन गठजोड़ो के चलते कुंठा के अतिरिक्त कोई भी लाभ नहीं मिलने वाला हैठुमका लगाने वालों में स्पेशल ब्रांच के डिप्टी एस.पी वी एन साल्वे, चेम्बूर के .सी.पी प्रकाश वाणी, सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर तुलसी दास खाकर, एंटी एक्सटॉर्शन सेल के अधिकारी खालटकर और कांस्टेबल सालुंखे प्रमुख हैंइसी तरह के गठजोड़ जिले स्तर पर, प्रदेश स्तर पर राष्ट्र के स्तर पर हैंविधयिका कार्यपालिका पर उनका कब्ज़ा बना रहता है

सुमन
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नया बर्ष आपको तथा आपके परिवार जनों को मंगलमय हो.

दोस्तों हिन्दुस्तान का दर्द का काफिला काफी हद तक बढ चुका है और इसमें हमारे आप जैसे सहयोगी मित्रों का साथ रहा है ..
तो दोस्तों आशा है की आप लोगों का साथ यूँ ही बना रहेगा और २०१० में हम कई और लक्ष्यों को हासिल करने में कामयाब हो पाएंगे..दोस्ती बस शर्त इतनी है की हम मिलकर रहे..एकता के साथ रहे....
संजय सेन अगर आपके किसी काम आ सकता है तो बेहिचक संपर्क करें ,
और रही बात मेरी तो
मैं आप लोगों के सहारे के बिना एक कदम भी नहीं चल सकता सो मेरे साथ इस प्यार को बनाये रखें...

नया बर्ष आपको तथा आपके परिवार जनों को मंगलमय हो..

संजय सेन सागर
09907048438


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गीतिका: तितलियाँ --संजीव 'सलिल'

गीतिका

तितलियाँ

संजीव 'सलिल'
*
यादों की बारात तितलियाँ.

कुदरत की सौगात तितलियाँ..

बिरले जिनके कद्रदान हैं.

दर्द भरे नग्मात तितलियाँ..

नाच रहीं हैं ये बिटियों सी

शोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ..

बद से बदतर होते जाते.

जो, हैं वे हालात तितलियाँ..

कली-कली का रस लेती पर

करें न धोखा-घात तितलियाँ..

हिल-मिल रहतीं नहीं जानतीं

क्या हैं शाह औ' मात तितलियाँ..

'सलिल' भरोसा कर ले इन पर

हुईं न आदम-जात तितलियाँ..

*********************************

Acharya Sanjiv Salil

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Saturday, January 2, 2010

गीतिका: तुमने कब चाहा दिल दरके? --संजीव वर्मा 'सलिल'

गीतिका

संजीव वर्मा 'सलिल'
*
तुमने कब चाहा दिल दरके?

हुए दिवाने जब दिल-दर के।

जिन पर हमने किया भरोसा

वे निकले सौदाई जर के..

राज अक्ल का नहीं यहाँ पर

ताज हुए हैं आशिक सर के।

नाम न चाहें काम करें चुप

वे ही जिंदा रहते मर के।

परवाजों को कौन नापता?

मुन्सिफ हैं सौदाई पर के।

चाँद सी सूरत घूँघट बादल

तृप्ति मिले जब आँचल सरके.

'सलिल' दर्द सह लेता हँसकर

सहन न होते अँसुआ ढरके।

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लो क सं घ र्ष !: विधि में संसोधन कोई विकल्प नहीं है

रुचिका प्रकरण के बाद विधि मंत्रालय से लेकर आम जनता तक पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री रठौड़ को कम सजा दिए जाने को लेकर एक बहस प्रारंभ हो गयी है सरकार बगैर सोचे समझे जनता की भावनाओ के दबाव में विधि में संशोधन कर रही है जिसका कोई औचित्य नहीं हैन्यायलयों में अभियोजन पक्ष की नाकामियों के लिए विधि को दोषी नहीं ठहराया नहीं जा सकता हैन्यायलयों की कार्यवाहियों में अभियोजन पक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका होती है अभियोजन पक्ष सम्बंधित राज्य सरकार के प्रति उत्तरदायी होता हैव्यवहार में मजिस्टे्ट ट्रायल में सहायक अभियोजन अधिकारी सरकार के पक्ष की तरफ से अधिवक्ता होते हैंजो दोनों पक्षों से लाभान्वित होते हैं पीड़ित पक्ष को उनको खुश करने के लिए कोई समझ नहीं होती है इसलिए अभियोजन पक्ष न्यायलयों में बचावपक्ष से मिलकर सही प्रक्रिया नहीं होने देता हैजब कोई अपराधिक वाद किसी भी थाने में दर्ज होता है तो कुछ अपराधों को छोड़ कर सभी अपराधों की विवेचना सब इंस्पेक्टर करता है जिसकी निगरानी के लिए डिप्टी एस.पी, एड़ीशनल एस.पी, एस.पी, एस.एस.पी, डी.आई.जी, आई.जी, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिदेशक होते हैंइतने महत्त्वपूर्ण अधिकारीयों की देख-रेख में हो रही विवेचना का स्तर बहुत घटिया स्तर का होता है इन अधिकारीयों की मद्दद के लिए सहायक अभियोजन अधिकारी, अभियोजन अधिकारी, विशेष अभियोजन अधिकारी सहित एक विशेष कैड़र अभियोजन का होता हैवर्तमान में इनकी भूमिका का स्तर भी बहुत ही निकिष्ट कोटि का होता है. वर्तमान भारतीय समाज में फैले भ्रष्टाचार की गंगोत्री में स्नान करने के बाद सजा की दर क्या हो सकती है आप सोच सकते हैंगंगा अगर मैली है तो स्नान के बाद चर्म रोग निश्चित रूप से होना है उसी तरह अभियोजन पक्ष भ्रष्टाचार की गंगोत्री में हर समय स्नान कर रहा है तो क्या स्तिथि होगी? इसलिए आवश्यक यह है की इस भ्रष्टाचार को अगर दूर कर दिया जाएहजारों लाखों रुचिकाओं को न्यायलय में आने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगीविधि में संशोधन की आवश्यकता नहीं है जरूरत है उसको लागू करने वाली एजेंसियों में सुधार की जिसके लिए कोई सरकार तैयार नहीं है

सुमन
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Friday, January 1, 2010

शुभ कामनाएं सभी को... संजीव "सलिल"

शुभ कामनाएं सभी को...

संजीव "सलिल"

salil.sanjiv@gmail.com
divyanarmada.blogspot.com

शुभकामनायें सभी को, आगत नवोदित साल की.
शुभ की करें सब साधना,चाहत समय खुशहाल की..

शुभ 'सत्य' होता स्मरण कर, आत्म अवलोकन करें.
शुभ प्राप्य तब जब स्वेद-सीकर राष्ट्र को अर्पण करें..

शुभ 'शिव' बना, हमको गरल के पान की सामर्थ्य दे.
शुभ सृजन कर, कंकर से शंकर, भारती को अर्ध्य दें..

शुभ वही 'सुन्दर' जो जनगण को मृदुल मुस्कान दे.
शुभ वही स्वर, कंठ हर अवरुद्ध को जो ज्ञान दे..

शुभ तंत्र 'जन' का तभी जब हर आँख को अपना मिले.
शुभ तंत्र 'गण' का तभी जब साकार हर सपना मिले..

शुभ तंत्र वह जिसमें, 'प्रजा' राजा बने, चाकर नहीं.
शुभ तंत्र रच दे 'लोक' नव, मिलकर- मदद पाकर नहीं..

शुभ चेतना की वंदना, दायित्व को पहचान लें.
शुभ जागृति की प्रार्थना, कर्त्तव्य को सम्मान दें..

शुभ अर्चना अधिकार की, होकर विनत दे प्यार लें.
शुभ भावना बलिदान की, दुश्मन को फिर ललकार दें..

शुभ वर्ष नव आओ! मिली निर्माण की आशा नयी.
शुभ काल की जयकार हो, पुष्पा सके भाषा नयी..

शुभ किरण की सुषमा, बने 'मावस भी पूनम अब 'सलिल'.
शुभ वरण राजिव-चरण धर, क्षिप्रा बने जनमत विमल..

शुभ मंजुला आभा उषा, विधि भारती की आरती.
शुभ कीर्ति मोहिनी दीप्तिमय, संध्या-निशा उतारती..

शुभ नर्मदा है नेह की, अवगाह देह विदेह हो.
शुभ वर्मदा कर गेह की, किंचित नहीं संदेह हो..

शुभ 'सत-चित-आनंद' है, शुभ नाद लय स्वर छंद है.
शुभ साम-ऋग-यजु-अथर्वद, वैराग-राग अमंद है..

शुभ करें अंकित काल के इस पृष्ट पर, मिलकर सभी.
शुभ रहे वन्दित कल न कल, पर आज इस पल औ' अभी..

शुभ मन्त्र का गायन- अजर अक्षर अमर कविता करे.
शुभ यंत्र यह स्वाधीनता का, 'सलिल' जन-मंगल वरे..

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ब्लॉगिंग पर किताब...ब्योरा चाहिए

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हिंदी ब्लॉगिंग पर एक महत्वपूर्ण किताब का प्रकाशन हो रहा है. मार्च तक किताब प्रकाशित होने की पूरी संभावना है. 
पुस्तक में शामिल करने के लिए कृपया ये जानकारी मुहैया कराएं. ब्योरा कृपया मेरे ई-मेल chandiduttshukla@gmail.com पर भेजें.

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1. कृपया ई-मेल की सब्जेक्ट लाइन में ज़रूर लिखें....blog-book : (your name)
जैसे- blog-book : chandiduttshukla

2. विवरण यूनिकोड में भेजें और इसके लिए तीन दिन का समय ही लें. पुस्तक में कुछ इनपुट जोड़ना बाकी रह गया है और किताब इसी माह के अंत में प्रोडक्शन के लिए चली जाएगी.

-- एक अनुरोध और है.
मेरे पास जितने ब्लॉगर्स का मेल आईडी है, मैं उन्हें तो सूचना भेज ही रहा हूं. यदि आपके परिचय सूत्र में कोई अन्य साथी हैं, तो उन्हें भी कृपया ये ई-मेल फारवर्ड कर दें.


धन्यवाद,


चण्डीदत्त शुक्ल
टेलिविजन पत्रकार
नोएडा

मेरा मोबाइल नंबर है 09873779183.

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