Thursday, January 7, 2010
लो क सं घ र्ष !: आयातित कार्यपालिका
भारतीय वर्तमान व्यवस्था में इसी तरह विधि का निर्माण हो रहा है और उसको लागू करने वाली कार्यपालिका का हाल भी यही है कई बार व्यक्ति के जिन्दा रहने के बावजूद उसी व्यक्ति की हत्या के आरोप में लोगों को आजीवन कारावास तक की सजा हो चुकी है न्यायलय वारंट जारी नहीं करते हैं और अभियुक्त जो बराबर पेशी पर आ रहा होता है। पुलिस वारंट के नाम पर पकड़ कर अदालत के समक्ष पेश भी कर देती है। पत्रावली देखने पर मालूम होता है कि न्यायलय ने वारंट जारी ही नहीं किया है । अगर हमारी कार्यपालिका के प्रमुखों में इस देश के प्रति जरा भी ईमानदारी, नैतिकता का बोध हो तो ये समस्याएं सामान्य तरीके से हल हो सकती हैं एक छोटा सा उदहारण लिख रहा हूँ कि जिला मजिस्टेट चरित्र प्रमाण पत्र जारी करते हैं। प्रार्थना पत्र के साथ सम्बंधित लिपिक को मात्र सौ रुपये देना तुरंत अनिवार्य है। इसके पश्चात प्रार्थना पत्र की कांपी पुलिस अधीक्षक कार्यालय जाती है, वहां पर सरकारी फीस 20 रुपये जमा करने के लिए 100 रुपये देना होता है । वहां से प्रार्थना पत्र सम्बंधित थाने को जाता है । थाने वाले कम से कम 1000 रुपये प्रार्थना पत्र पर रिपोर्ट लगाने के लिए लेते हैं और जब यह रिपोर्ट लौट कर पुलिस अधीक्षक कार्यालय लौट कर आती है तो मालूम चलता है कि थानाध्यक्ष ने रिपोर्ट निर्धारित प्रोफार्मे पर प्रेषित नहीं की है और फिर थाने पर उतने ही रुपये खर्च कर निर्धारित प्रोफार्मे पर रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक कार्यालय आती है । पुलिस फिर लोकल इंटेलीज़ेंस यूनिट से रिपोर्ट मांगी जाती है । वहां भी लगभग 500 रुपये अवैध रूप से देने पड़ेंगे वर्ना वे कभी रिपोर्ट नहीं लगायेंगे । प्रार्थना पत्र अपराध नियंत्रण ब्यूरो जाता है जहाँ पर अवैध रूप से आपने रुपया नहीं दिया तो जनपद के समस्त थानों से रिपोर्ट नहीं लग पाती है । इतना सब करने में लगभग 2000 रुपये और एक महीने बराबर भाग दौड़ के बाद पुलिस अधीक्षक चरित्र प्रमाण पत्र के लिए जिला मजिस्टेट को संस्तुति करते हैं। इसके पश्चात जिला मजिस्टेट के यहाँ कोई न कोई कामा. फूल्स्टॉप लगा कर पुलिस अधीक्षक को वापस भेज दिया जाता है। फिर वह कमी 15 दिन में ठीक कराकर जिला मजिस्टेट कार्यालय भेजवाइये तब वहां एक अच्छी खासी रकम दीजिये तब जाकर जिला मजिस्टेट से चरित्र प्रमाण पत्र प्राप्त होगा। अगर इस कार्यवाही में 6 माह से अधिक लग गए तो पुनः यही प्रक्रिया अपनाई जाएगी । हमारी कार्यपालिका में इच्छा शक्ति का अभाव है या कभी कभी ऐसा महसूस होता है की कार्यपालिका हमारे देश की न होकर आयातित कार्यपालिका है ।
सुमन
loksangharsha.blogspot.com...आगे पढ़ें!
बेदम रहीं बोलोराम, 3 इडियट का सम्मोहन
बॉक्स ऑफिस:पहलासप्ताह
बोलोराम, रात गई बात गई और एक्सीडेंट ऑन हिल रोड जैसी फिल्मों के साथ साल 2010 शुरु हुआ लेकिन बॉक्स ऑफिस पर इन फिल्मों को दर्शकों का कोई विशेष प्रसाद नहीं मिला। दरअसल 3 इडियट का सम्मोहन बॉक्स ऑफिस पर कुछ इस कदर चला कि इस फिल्म ने अपने दूसरे सप्ताह में भी हाउसफुल गई है।
एक तरफ 3 इडियट अपनी कहानी, खास किस्म की मार्केटिंग और लेखन पर अधिकार को लेकर विवाद के चलते चर्चा में रही वहीं इस शोर में साल 2010 की तिनों फिल्में मात खा गई। बोलोराम और एक्सीडेंट ऑन हिल रोड कमजोर स्टॉर कास्ट और बेदम पटकथा के चलते दर्शकों को ध्यान नहीं खीच पाई हा रात गई बात गई ने मेट्रो शहरों में कुछ दर्शक जरूर जुटाए लेकिन यह संख्या ऐसी नहीं थी जो कुछ उम्मीद जगाती हो।
कुल मिलाकर नई फिल्मों के लिए साल 2010 का पहला सप्ताह बेहद निराशाजनक रहा है और 3 इडियट ने ब्लॉकबस्टर सफलता हासिल कर एक नया रिकार्ड अपने नाम कर लिया है। एक तरफ दमदार पटकथा, सोचा समझा प्रचार और जनता को क्लीक कर गया तो दूसरी तरफ साल की पहली तीन फिल्में असफल साबित हुई है।
यहां तक की छोटे शहरों में भी दर्शक इन फिल्मों को देखने नहीं पहुंचा है। लेकिन 3 इडियट ने अपनी सफलता से बॉक्स ऑफिस पर जिस तरह से भीड़ जुटाई है उससे बॉलीवुड में खुशी का माहौल है और 8 तारीख को रिलीज होने जा रही लब इंपासिबल और दुल्हा मिल गया है से बॉलीवुड की उम्मीदें बढ़ गई है। बड़े बैनर की इन दोनों फिल्मों पर सबकी नजर लगी हुई है।
Wednesday, January 6, 2010
लो क सं घ र्ष !: लोकतंत्र का नया संस्करण
बिजली न डीजल पानी खींचे हर पल
उज्जैन से 20 किमी दूर छोटे से गांव कांकरिया चीराखान में नए दशक की उम्मीदें आकार ले रही हैं। यहां एक छोटे से वर्कशॉप में सिर झुकाए, हाथों में ग्रीस लगाए राधेश्याम शर्मा एक ऐसी मशीन बनाने में जुटे हैं जो बिना बिजली या डीजल के 24 घंटे बोरवेल से पानी खींचेगी। इस प्रयोग के सफल होने पर न केवल बिजली की कमी से जूझ रहे लाखों किसानों को फायदा होगा, बल्कि प्रदूषण न होने के कारण पर्यावरण की सेहत भी सुधरेगी।
भी रोकें।Tuesday, January 5, 2010
लो क सं घ र्ष !: बेनी प्रसाद का कांग्रेस में भविष्य
समाजवादी तहरीक से पोषित हो कर राजनीति में अपना कदम रखने वाले बेनी वर्मा के राजनीतिक जीवन का आगाज चरण सिंह के लोकदल से हुआ जो अपनी चौधरी चरण सिंह स्टाइल की ऐंठ व बरर के साथ राजनीति में अपनी स्वार्थ की प्रवत्ति के लिए प्रसिद्ध थे। बेनी का फिर साथ हुआ उस मुलायम सिंह से जिन्होंने अपने कर्णधार विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ घात करके समाजवादी पार्टी का गठन वर्ष 1989 में किया। फिर कशीराम के साथ उनका गठबंधन 1992 मनें बाबरी मस्जिद विध्वंश के बाद हुआ परन्तु वह भी मात्र डेढ़ वर्षों में ढेर हो गया।
उसके बाद बेनी प्रसाद वर्मा व मुलायम सिंह के रिश्तों में खटास समाजवादी पार्टी में अमर सिंह की आमद के बाद शुरू हुई जो अंत में 2007 के चुनाव से पूर्व बेनी के पार्टी से बागी होने के बाद पूर्णतया कड़वाहट में बदल गयी। बेनी ने अलग अपने दल का गठन समाजवादी क्रांति दल (एस.के.डी) कर के इंडियन जस्टिस पार्टी के साथ समझौता किया और पूरे प्रदेश में चुनाव लड़े परन्तु उन्हें जबरदस्त विफलता हाथ लगी यहाँ तक कि उनके गृह जनपद बाराबंकी में भी उनका सफाया हो गया उनका पुत्र एवं भूतपूर्व राज्य मंत्री राकेश कुमार वर्मा को भी अपने पिता की कर्म भूमि मसौली से शिकस्त खानी पड़ी।
राजनीति में सब कुछ लुटाने के बाद बेनी प्रसाद ने कांग्रेस की डगर पर आ कर विराम किया और कांग्रेस ने उन्हें सम्मान देते हुए गोंडा से न सिर्फ टिकट दिया बल्कि देवीपाटन की लगभग सात सीटों का टिकट उनकी सलाह ले कर दिया। बेनी वर्मा खुद भी जीते और फैजाबाद बहराइच श्रावस्ती, सुल्तानपुर और महाराजगंज पर कांग्रेस को जीत दिलाई बाराबंकी में 1984 के बाद 25 साल के लम्बे अरसे बाद कांग्रेस को सफलता पुनिया की जीत के तौर पर मिली। इसमें कोई शक नहीं कि यदि बेनी की कुर्मी बिरादरी का समर्थन पुनिया को न होता और एक बड़ा बेस वोट बैंक पुनिया के पास न होता तो फिर पुनिया की सफलता की राह आसान न होती।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सफलता का डंका भले ही बेनी वर्मा के लोग पीटते फिरें परन्तु कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व व प्रदेश कांग्रेस इसे राहुल का करिश्मा मानते हैं और सपा, बसपा व भाजपा से परेशान होकर ऊब चुकी जनता का पुन: कांग्रेस की ओर वापसी मान रहे हैं। उधर बेनी है कि आज भी अपने अड़ियल रवैये पर टिके हैं और उस पार्टी को आँख दिखा रहे हैं जिसके बारे में यह कहा जाता है कि वह राजनीति का महासागर है जिससे अलग होकर सभी दरिया निकले हैं चाहे वह भाजपा हो या समाजवादी, चाहे वह लोकदल हो या डी.ऍम.के , अन्ना डी ऍम.के चाहे वह तृणमूल कांग्रेस हो या राष्ट्रवादी कांग्रेस। यहाँ तक की भारतीय जनसंघ भी कांग्रेस के कोख से पैदा हुई पार्टी है. केवल कम्युनिस्ट पार्टियों को यह गौरव प्राप्त है कि उनका उदय कांग्रेस की कोख से नहीं हुआ।
जहाँ तक कांग्रेस में बेनी वर्मा के भविष्य का प्रश्न है तो वह बहुत उज्जवल नजर नहीं आता क्योंकि बेनी प्रसाद वर्मा की राजनीतिक पृष्टभूमि स्वार्थ की राजनीति और अवसरवादिता की बैसाखी पर टिकी हुई है विचारों के आधार पर कभी भी उनकी समानता कांग्रेसियों से नहीं हो सकती. कांग्रेस ने वर्ष 2007 में यदि बेनी वर्मा के कंधे पर हाथ रखा तो उसका लक्ष्य मुलायम व उनकी पार्टी सपा को कमजोर करना था सो उन्होंने सफलता के साथ वह कारनामा अंजाम दिया। अब चूँकि 2012 का आपरेशन उत्तर प्रदेश का लक्ष्य अभी कांग्रेस को प्राप्त करना है इसलिए बेनी वर्मा के बडबोलेपन को वह बर्दाश्त कर रही है परन्तु अधिक समय तक नहीं।
उधर बेनी वर्मा को भी एस.के.डी के प्रयोग के विफल हो जाने के पश्चात एक राजनीतिक छतरी की आवश्यकता थी सो वह उसके नीचे से आसानी से निकलने वाले नहीं जबतक उन्हें कोई नई छतरी न मिल जाए।
मो॰ तारिक खान...आगे पढ़ें!
ब्लैक न्यू इयर मुबारक हो

''हिन्दुस्तान का दर्द'' देश में बढ़ रही अपराधिक गतिविधियों,छात्रों के द्वारा की जा रही आत्महत्याओं एवं देश में बढ रही आतंकबादी हरकतों का विरोध करता है..
Monday, January 4, 2010
लो क सं घ र्ष !: फास्ट ट्रैक कोर्ट पर विचरण का एक दृश्य
सुमन
loksangharsha.blogspot.com...आगे पढ़ें!
घर से भागी हुई एक लड़की का ख़त
प्रिय मित्रों,
श्री योगेश छिब्बर ने एक कहानी लिखी है जो कुछ यों शुरु होती है -
पापा:
आपके पिता होने में न सुंदरता है, न कोमलता, न कोई मीठा गीत। आपकी बेटी होना अपमान है, अपराध है, पाप है; आप मेरे स्त्री होने की सुंदरता पर हावी नहीं हो सकते। इसीलिए मैं आपको अपनी बाक़ी ज़िंदगी में से घटा देना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ आप शून्य हो जाएँ, मेरे वजूद में से बाहर हों, ताकि मैं खूबसूरत और मुकम्मल हो सकूँ।
श्री योगेश छिब्बर की पूरी कहानी यहां प्रकाशित हुई है व इस कहानी पर प्रतिक्रिया भी ।
जहां तक, इस कहानी का संबंध है, मैं इसे पसन्द नहीं कर पा रहा हूं। फर्क दृष्टिकोण का है। मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर योगेश छिब्बर पाठकों को इस कहानी के माध्यम से संदेश क्या देना चाह रहे हैं। जो संदेश मुझे इस कहानी से मिलता प्रतीत हो रहा है वही यदि इस कहानी का वास्तविक संदेश है तो मुझे यह संदेश न तो जनहित में लगता है और न ही स्वीकार्य ही है।
- सुशान्त सिंहल
आप भी इसे पढ़ें व अपनी प्रतिक्रिया दें तो यह सार्थक संवाद आगे बढ़ सकेगा ।
सुशान्त सिंहल
Sunday, January 3, 2010
लो क सं घ र्ष !: मोहे आई न जग से लाज..........
पुलिस अपराधी गठजोड़ की यह छोटी मिसाल है अपराधियों ने राजनेताओं, पुलिस के उच्च से उच्चतम अफसर तक गठजोड़ बना लिया है अपराधियों ने न्यायिक अधिकारियो में भी निचले स्तर पर पहुँच बना रखी है जिससे आम जनता को इन गठजोड़ो के चलते कुंठा के अतिरिक्त कोई भी लाभ नहीं मिलने वाला है। ठुमका लगाने वालों में स्पेशल ब्रांच के डिप्टी एस.पी वी एन साल्वे, चेम्बूर के ए.सी.पी प्रकाश वाणी, सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर तुलसी दास खाकर, एंटी एक्सटॉर्शन सेल के अधिकारी खालटकर और कांस्टेबल सालुंखे प्रमुख हैं । इसी तरह के गठजोड़ जिले स्तर पर, प्रदेश स्तर पर व राष्ट्र के स्तर पर हैं। विधयिका कार्यपालिका पर उनका कब्ज़ा बना रहता है ।
सुमन
loksangharsha.blogspot.com...आगे पढ़ें!
नया बर्ष आपको तथा आपके परिवार जनों को मंगलमय हो.
गीतिका: तितलियाँ --संजीव 'सलिल'
तितलियाँ
संजीव 'सलिल'
*
यादों की बारात तितलियाँ.
कुदरत की सौगात तितलियाँ..
बिरले जिनके कद्रदान हैं.
दर्द भरे नग्मात तितलियाँ..
नाच रहीं हैं ये बिटियों सी
शोख-जवां ज़ज्बात तितलियाँ..
बद से बदतर होते जाते.
जो, हैं वे हालात तितलियाँ..
कली-कली का रस लेती पर
करें न धोखा-घात तितलियाँ..
हिल-मिल रहतीं नहीं जानतीं
क्या हैं शाह औ' मात तितलियाँ..
'सलिल' भरोसा कर ले इन पर
हुईं न आदम-जात तितलियाँ..
*********************************
Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com...आगे पढ़ें!
Saturday, January 2, 2010
गीतिका: तुमने कब चाहा दिल दरके? --संजीव वर्मा 'सलिल'
संजीव वर्मा 'सलिल'
*
तुमने कब चाहा दिल दरके?
हुए दिवाने जब दिल-दर के।
जिन पर हमने किया भरोसा
वे निकले सौदाई जर के..
राज अक्ल का नहीं यहाँ पर
ताज हुए हैं आशिक सर के।
नाम न चाहें काम करें चुप
वे ही जिंदा रहते मर के।
परवाजों को कौन नापता?
मुन्सिफ हैं सौदाई पर के।
चाँद सी सूरत घूँघट बादल
तृप्ति मिले जब आँचल सरके.
'सलिल' दर्द सह लेता हँसकर
सहन न होते अँसुआ ढरके।
**********************...आगे पढ़ें!
लो क सं घ र्ष !: विधि में संसोधन कोई विकल्प नहीं है
सुमन
loksangharsha.blogspot.com...आगे पढ़ें!
Friday, January 1, 2010
शुभ कामनाएं सभी को... संजीव "सलिल"
संजीव "सलिल"
salil.sanjiv@gmail.com
divyanarmada.blogspot.com
शुभकामनायें सभी को, आगत नवोदित साल की.
शुभ की करें सब साधना,चाहत समय खुशहाल की..
शुभ 'सत्य' होता स्मरण कर, आत्म अवलोकन करें.
शुभ प्राप्य तब जब स्वेद-सीकर राष्ट्र को अर्पण करें..
शुभ 'शिव' बना, हमको गरल के पान की सामर्थ्य दे.
शुभ सृजन कर, कंकर से शंकर, भारती को अर्ध्य दें..
शुभ वही 'सुन्दर' जो जनगण को मृदुल मुस्कान दे.
शुभ वही स्वर, कंठ हर अवरुद्ध को जो ज्ञान दे..
शुभ तंत्र 'जन' का तभी जब हर आँख को अपना मिले.
शुभ तंत्र 'गण' का तभी जब साकार हर सपना मिले..
शुभ तंत्र वह जिसमें, 'प्रजा' राजा बने, चाकर नहीं.
शुभ तंत्र रच दे 'लोक' नव, मिलकर- मदद पाकर नहीं..
शुभ चेतना की वंदना, दायित्व को पहचान लें.
शुभ जागृति की प्रार्थना, कर्त्तव्य को सम्मान दें..
शुभ अर्चना अधिकार की, होकर विनत दे प्यार लें.
शुभ भावना बलिदान की, दुश्मन को फिर ललकार दें..
शुभ वर्ष नव आओ! मिली निर्माण की आशा नयी.
शुभ काल की जयकार हो, पुष्पा सके भाषा नयी..
शुभ किरण की सुषमा, बने 'मावस भी पूनम अब 'सलिल'.
शुभ वरण राजिव-चरण धर, क्षिप्रा बने जनमत विमल..
शुभ मंजुला आभा उषा, विधि भारती की आरती.
शुभ कीर्ति मोहिनी दीप्तिमय, संध्या-निशा उतारती..
शुभ नर्मदा है नेह की, अवगाह देह विदेह हो.
शुभ वर्मदा कर गेह की, किंचित नहीं संदेह हो..
शुभ 'सत-चित-आनंद' है, शुभ नाद लय स्वर छंद है.
शुभ साम-ऋग-यजु-अथर्वद, वैराग-राग अमंद है..
शुभ करें अंकित काल के इस पृष्ट पर, मिलकर सभी.
शुभ रहे वन्दित कल न कल, पर आज इस पल औ' अभी..
शुभ मन्त्र का गायन- अजर अक्षर अमर कविता करे.
शुभ यंत्र यह स्वाधीनता का, 'सलिल' जन-मंगल वरे..
*******************...आगे पढ़ें!





